काँटों संग पली मैं...
काँटों संग पली मैं,
कैसे फूलों की चाह रखु...
ना देखे रंग कभी-ना खुशबु ही,
कैसे फिर इसकी राह देखु...
काँटों ने की है वफा,
साथ रहे हर दफा...
फूल तो थे हमेशा से ही,
हमारे लिए बेवफा...
करू मोहब्बत,
रंगो की रौनक से...
या निभाऊ इश्क,
घने काले बादलों से...
अब तो हो चुकी है आदत,
काले रंग और काँटों की...
फूलों से हो चुकी नफरत,
अब चाहते हैं, सिर्फ काँटों की...
- Pranjali Ashtikar

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